UP में ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने पर हाईकोर्ट ने उठाए सवाल, सरकार से मांगा जवाब
UP: उत्तर प्रदेश सरकार ने पंचायतों के मौजूदा प्रधानों को अगले चुनाव तक प्रशासक बनाए रखने का फैसला किया है, लेकिन अब इस फैसले पर कानूनी संकट खड़ा हो गया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने इस कदम पर गंभीर संवैधानिक सवाल
UP: उत्तर प्रदेश सरकार ने पंचायतों के मौजूदा प्रधानों को अगले चुनाव तक प्रशासक बनाए रखने का फैसला किया है, लेकिन अब इस फैसले पर कानूनी संकट खड़ा हो गया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने इस कदम पर गंभीर संवैधानिक सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि इस व्यवस्था से संवैधानिक नियमों का क्या होगा और इसका जवाब अगली सुनवाई तक देना होगा।
यह पूरा मामला एक जनहित याचिका (PIL) से शुरू हुआ जिसे संजय कुमार शर्मा ने दायर किया है। 7 जुलाई 2026 को हुई सुनवाई के दौरान कोर्ट ने राज्य सरकार को दो दिन के भीतर जवाब देने को कहा और पंचायती राज विभाग के अपर मुख्य सचिव को तलब किया। 10 जुलाई को हुई अगली सुनवाई में कोर्ट ने अपर मुख्य सचिव को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है।
कोर्ट मुख्य रूप से इस बात की जांच कर रहा है कि क्या उत्तर प्रदेश पंचायती राज अधिनियम की धारा 12(3-ए) संवैधानिक रूप से सही है। न्यायाधीश राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की बेंच ने सवाल किया कि क्या निवर्तमान प्रधानों को प्रशासक बनाना उनके कार्यकाल को गलत तरीके से बढ़ाना है। कोर्ट का मानना है कि यह व्यवस्था राज्य निर्वाचन आयोग के उन अधिकारों में दखल दे सकती है, जिसके तहत उसे समय पर चुनाव कराने होते हैं।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने साल 2000 के ‘प्रेम लाल पटेल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ मामले का जिक्र किया, जिसमें इसी तरह के एक प्रावधान को असंवैधानिक माना गया था। कोर्ट ने कहा कि यह मामला संविधान के अनुच्छेद 243-E (पंचायतों का कार्यकाल) और 243-K (निर्वाचन आयोग की शक्तियां) के खिलाफ हो सकता है। इस मामले की अगली महत्वपूर्ण सुनवाई 23 जुलाई 2026 को होगी, जिसमें अन्य संबंधित याचिकाओं को भी साथ रखकर विचार किया जाएगा।