Bihar और West Bengal: बिहार और बंगाल के मैदानी इलाकों से निकलने वाला प्रदूषण अब हिमालय की ऊंची चोटियों तक पहुंच गया है। NASA के एक ताजा अध्ययन में सामने आया है कि इस प्रदूषण की वजह से वहां की सफेद बर्फ काली पड़ रही है। ज
Bihar और West Bengal: बिहार और बंगाल के मैदानी इलाकों से निकलने वाला प्रदूषण अब हिमालय की ऊंची चोटियों तक पहुंच गया है। NASA के एक ताजा अध्ययन में सामने आया है कि इस प्रदूषण की वजह से वहां की सफेद बर्फ काली पड़ रही है। जब बर्फ काली होती है, तो वह सूरज की गर्मी को ज्यादा सोखती है, जिससे ग्लेशियर बहुत तेजी से पिघल रहे हैं।
ग्लेशियर काले क्यों हो रहे हैं और इसका क्या असर होगा?
नासा के ‘ब्लैक सूट एंड सर्वाइवल ऑफ तिब्बतन ग्लेशियर’ अध्ययन के मुताबिक, गाड़ियों का धुआं और खेतों या कचरे में बायोमास जलाने से ‘ब्लैक कार्बन’ पैदा होता है। यह कार्बन हवा के जरिए उड़कर हिमालय की बर्फ पर जमा हो रहा है। पर्यावरणविद् पी.के. दास ने बताया कि बिहार और बंगाल भौगोलिक रूप से पूर्वी हिमालय के करीब हैं, इसलिए सिक्किम, भूटान और नेपाल के ग्लेशियर सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। इससे भविष्य में बड़ी तबाही आने का खतरा बढ़ गया है।
प्रदूषण के स्तर में कितनी बढ़ोतरी हुई है?
साल 2000 से 2024 के बीच के आंकड़ों का विश्लेषण करने पर पता चला है कि सिंधु-गंगा के मैदानों और उत्तर-पूर्व भारत में पीएम (पर्टिकुलेट मैटर) में 20 प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि हुई है। वहीं, ऑर्गेनिक कार्बन और सल्फेट की मात्रा में 50 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है।
- बिहार और बंगाल देश के प्रदूषण हॉटस्पॉट बन गए हैं।
- थर्मल पावर प्लांट और शहरी कचरा जलाने से स्थिति और गंभीर हुई है।
- गांवों में अब भी लकड़ी और गोबर के उपले जलाने की समस्या बनी हुई है।
- डॉ. पलक बलियान के अनुसार, ग्लेशियर पिघलने से करीब 2 अरब लोगों के लिए मीठे पानी का संकट पैदा हो सकता है।
Frequently Asked Questions (FAQs)
बिहार और बंगाल का प्रदूषण हिमालय तक कैसे पहुंच रहा है?
वाहनों के धुएं, थर्मल पावर प्लांट और बायोमास (लकड़ी-उपले) जलाने से निकलने वाला ब्लैक कार्बन हवा के साथ उड़कर हिमालय की बर्फ पर जमा हो रहा है, जिससे बर्फ काली पड़ रही है।
ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?
ग्लेशियर पिघलने से दुनिया के लगभग दो अरब लोगों के लिए मीठे पानी के संसाधन खतरे में पड़ सकते हैं और भविष्य में प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ सकता है।