Maharashtra: मुंबई की गलियों में चाय और बन-मस्का के लिए मशहूर Irani Cafes शहर की पहचान बन चुके हैं। क्या आप जानते हैं कि ये कैफे ज्यादातर सड़क के कोनों यानी नुक्कड़ पर ही क्यों मिलते हैं। इसके पीछे वास्तु शास्त्र की पुरा
Maharashtra: मुंबई की गलियों में चाय और बन-मस्का के लिए मशहूर Irani Cafes शहर की पहचान बन चुके हैं। क्या आप जानते हैं कि ये कैफे ज्यादातर सड़क के कोनों यानी नुक्कड़ पर ही क्यों मिलते हैं। इसके पीछे वास्तु शास्त्र की पुरानी मान्यताएं और ईरान से आए प्रवासियों का संघर्ष छिपा है, जिन्होंने शहर के अनचाहे प्लॉट को अपनी पहचान बना लिया।
नुक्कड़ पर ही क्यों बसे ये कैफे
19वीं और 20वीं सदी के अंत में जब ईरान से पारसी और शिया मुस्लिम मुंबई आए, तो उनके पास पैसे कम थे। उस समय स्थानीय हिंदू और मुस्लिम व्यापारी वास्तु शास्त्र की वजह से सड़क के कोने वाले प्लॉट को अशुभ मानते थे और उन्हें नहीं खरीदते थे। इस वजह से ये कोने वाले प्लॉट काफी सस्ते मिल जाते थे, जिन्हें ईरानी प्रवासियों ने खरीदकर अपने कैफे खोल लिए। एक्सपर्ट कुरुश दलाल के मुताबिक, वास्तु की इन्हीं मान्यताओं ने इन जगहों को सस्ता और सुलभ बनाया।
इन कैफे का सामाजिक महत्व और बनावट
कंजर्वेशन आर्किटेक्ट राहुल चेम्बुरकर बताते हैं कि कोने वाले प्लॉट के गेट चौड़े होते थे, जिससे मिल मजदूरों और आम जनता के लिए अंदर आना आसान था। इतिहासकार फलक चौधरी के अनुसार, ये कैफे सिर्फ खाने की जगह नहीं बल्कि सामाजिक केंद्र थे, जहाँ हर तबके के लोग एक साथ बैठते थे। लकी रेस्टोरेंट के मालिक सैयद सफ़र अली हुसैनी ने बताया कि ईरान के ‘क़हवा-काना’ (कॉफी हाउस) ही मुंबई में आकर ईरानी कैफे बने।
बदलते समय और चुनौतियों का असर
एक समय मुंबई में 300 से 400 ईरानी कैफे हुआ करते थे, लेकिन अब इनकी संख्या घटकर केवल 30-35 रह गई है। नई पीढ़ी की अरुचि और बढ़ती प्रतिस्पर्धा इसकी बड़ी वजह है। साथ ही, जनवरी 2025 में बॉम्बे हाई कोर्ट के एक निर्देश के बाद अब बेकरी में लकड़ी की भट्टी की जगह गैस या इलेक्ट्रिक ओवन का इस्तेमाल करना जरूरी हो गया है, जिससे पुराने कैफे के कामकाज के तरीके में बदलाव आया है।
- मशहूर कैफे: Britannia & Co., Kyani & Co., Yazdani Bakery, Café Military, Sassanian Boulangerie, Lucky Restaurant, B. Merwan & Co., और Koolar & Co.
Frequently Asked Questions (FAQs)
मुंबई के ईरानी कैफे सड़क के कोनों पर ही क्यों होते हैं?
स्थानीय व्यापारी वास्तु शास्त्र की वजह से कोने वाले प्लॉट को अशुभ मानते थे, जिससे उनकी कीमत कम थी। कम बजट वाले ईरानी प्रवासियों ने इन सस्ती जगहों का फायदा उठाकर यहाँ अपने कैफे खोले।
आजकल इन कैफे की संख्या कम क्यों हो रही है?
बढ़ती प्रतिस्पर्धा, मालिकाना हक की चुनौतियां और नई पीढ़ी का इस बिजनेस में रुचि न लेना मुख्य कारण हैं। अब शहर में केवल 30-35 के करीब ही ऐसे कैफे बचे हैं।