Maharashtra: मुंबई के उभरते फुटबॉल खिलाड़ियों के लिए अब मैदान ढूंढना मुश्किल हो गया है। शहर के सार्वजनिक मैदानों पर क्रिकेट का कब्जा है, जिसकी वजह से फुटबॉल खेलने वालों को निजी आर्टिफिशियल टर्फ का सहारा लेना पड़ रहा है।
Maharashtra: मुंबई के उभरते फुटबॉल खिलाड़ियों के लिए अब मैदान ढूंढना मुश्किल हो गया है। शहर के सार्वजनिक मैदानों पर क्रिकेट का कब्जा है, जिसकी वजह से फुटबॉल खेलने वालों को निजी आर्टिफिशियल टर्फ का सहारा लेना पड़ रहा है। यह स्थिति अब ‘पे-टू-प्ले’ बन गई है, जहां बिना पैसे दिए खेल का मौका मिलना लगभग नामुमकिन है।
सार्वजनिक मैदानों की क्या है हालत
मुंबई के ओवल मैदान, आजाद मैदान और शिवाजी पार्क जैसे बड़े मैदानों पर ज्यादातर क्रिकेट खेला जाता है। फुटबॉल खिलाड़ी पीक ऑवर्स में इन मैदानों का इस्तेमाल नहीं कर पाते। BMC गार्डन सेल (G-south ward) के अविनाश यादव ने बताया कि जगह की कमी के कारण फुटबॉल के लिए अलग से मैदान बनाना चुनौतीपूर्ण है। वहीं, 19 मई 2026 को BMC ने बांद्रा रिक्लेमेशन के एक फुटबॉल मैदान को ‘एग्जीबिशन सेंटर’ में बदलने का प्रस्ताव भी रखा है, जिससे खेलने की जगह और कम हो जाएगी।
निजी टर्फ और आर्थिक बोझ
सार्वजनिक मैदान न मिलने पर लोग प्राइवेट टर्फ की ओर जा रहे हैं, जिनका किराया 1,000 रुपये प्रति घंटा या उससे ज्यादा है। यह खर्च गरीब परिवारों के बच्चों के लिए उठाना मुश्किल है। Oscar Foundation के शंकर मेनन ने बताया कि उनकी संस्था बच्चों के एक ग्रुप के लिए टर्फ बुकिंग पर हर हफ्ते करीब 4,000 रुपये खर्च कर रही है। मुंबई फुटबॉल एसोसिएशन के हेनरी पिकार्डो ने चिंता जताई कि अगर सार्वजनिक जगह कम हुई, तो खेल पूरी तरह प्राइवेट टर्फ कल्चर पर निर्भर हो जाएगा।
एक्सपर्ट्स ने क्या कहा
India Rush Soccer Club के डायरेक्टर जॉर्ज लॉरेंस के मुताबिक, समस्या मैदानों की कमी नहीं बल्कि उनके मैनेजमेंट और विजन की है। वहीं, 18 मई 2026 के एक एडिटोरियल में मांग की गई कि शहरों में ऐसे मल्टीपर्पज इंडोर कॉम्प्लेक्स बनने चाहिए जहां बच्चे बिना भारी खर्च के खेल सकें। यह भी बात सामने आई कि नेशनल स्पोर्ट्स डेवलपमेंट फंड (NSDF) का पैसा खेल के बजाय नौकरशाही की सुविधाओं में इस्तेमाल हो रहा है, जिससे जमीनी स्तर पर खेल प्रभावित हो रहे हैं।
Frequently Asked Questions (FAQs)
मुंबई में फुटबॉल खेलने के लिए सार्वजनिक मैदान क्यों नहीं मिल रहे?
ओवल मैदान और शिवाजी पार्क जैसे सार्वजनिक मैदानों पर क्रिकेट का दबदबा है। साथ ही, BMC द्वारा बांद्रा रिक्लेमेशन जैसे मैदानों को कमर्शियल उपयोग (एग्जीबिशन सेंटर) में बदलने की योजना से जगह और घट रही है।
प्राइवेट टर्फ का खर्च कितना है और इसका क्या असर पड़ रहा है?
प्राइवेट टर्फ का किराया 1,000 रुपये प्रति घंटा से शुरू होता है। इस वजह से कम आय वाले परिवार और गरीब बच्चे फुटबॉल नहीं खेल पा रहे हैं, जिससे खेल केवल अमीरों तक सीमित होने का खतरा है।