Maharashtra: मुंबई की Cessed इमारतों में रहने वाले लोगों ने MHADA के उस प्रस्ताव को खारिज कर दिया है जिसमें उन्हें किराए के बदले मासिक सहायता देने की बात कही गई थी। लोग किराए के पैसों के बजाय तुरंत पुनर्वास आवास (Rehabil
Maharashtra: मुंबई की Cessed इमारतों में रहने वाले लोगों ने MHADA के उस प्रस्ताव को खारिज कर दिया है जिसमें उन्हें किराए के बदले मासिक सहायता देने की बात कही गई थी। लोग किराए के पैसों के बजाय तुरंत पुनर्वास आवास (Rehabilitation Housing) चाहते हैं। निवासियों का कहना है कि सरकारी पॉलिसी साफ नहीं है और उन्हें भविष्य में स्थायी घर मिलने की कोई गारंटी नहीं दिख रही है।
किराया ऑफर क्यों किया गया और लोगों ने क्यों मना किया?
MHADA ने उन लोगों को 20,000 रुपये महीना किराया देने का प्रस्ताव रखा था जिन्हें अपनी जर्जर इमारतों से खाली करना होगा। लेकिन निवासियों ने इसे स्वीकार नहीं किया क्योंकि उन्हें डर है कि एक बार घर खाली करने के बाद उन्हें स्थायी घर कब मिलेगा, इसकी कोई तय तारीख नहीं है। लोगों का मानना है कि बिना किसी ठोस योजना के घर छोड़ना जोखिम भरा है।
ट्रांजिट कैंप की कमी और पुराना डर
Mumbai Building Repairs and Reconstruction Board (MBRRB) के पास फिलहाल केवल 500 ट्रांजिट कैंप के कमरे उपलब्ध हैं, जबकि जरूरत इससे कहीं ज्यादा है। MHADA अधिकारियों ने कहा कि जब ये 500 कमरे भर जाएंगे, तब किराया स्कीम लागू होगी। वहीं, लोग पुराने अनुभवों से डरे हुए हैं क्योंकि कई परिवार पिछले 30 से 40 सालों से ट्रांजिट कैंपों में रह रहे हैं और उन्हें अब तक पक्का घर नहीं मिला है।
खतरे में हैं हजारों इमारतें
दक्षिण मुंबई में लगभग 13,000 Cessed इमारतें हैं, जिनमें से कई बहुत खराब हालत में हैं। मानसून से पहले खतरनाक इमारतों का सर्वे लगभग पूरा हो चुका है। MBRRB जल्द ही उन इमारतों की लिस्ट जारी करेगा जिन्हें तुरंत खाली कराना जरूरी है, जिससे आने वाले दिनों में विस्थापन की समस्या और बढ़ सकती है।
Frequently Asked Questions (FAQs)
MHADA निवासियों को कितने रुपये किराया दे रहा है?
MHADA ने जर्जर इमारतों से खाली होने वाले निवासियों को 20,000 रुपये प्रति माह किराया सहायता देने का प्रस्ताव दिया है।
मुंबई में कितनी Cessed इमारतें हैं और समस्या क्या है?
दक्षिण मुंबई में करीब 13,000 Cessed इमारतें हैं। समस्या यह है कि इनमें से कई जर्जर हैं और ट्रांजिट कैंपों की भारी कमी के कारण लोगों को स्थायी घर मिलने में देरी हो रही है।