Lucknow हाईकोर्ट का सख्त फैसला, सरकारी विभागों की लालफीताशाही और देरी का बहाना अब नहीं चलेगा

UP : इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने सरकारी विभागों के काम करने के तरीके पर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि सरकारी विभाग फाइलों के इधर-उधर होने या प्रशासनिक देरी का बहाना बनाकर समय सीमा के बाद दायर याचिकाओ

UP : इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने सरकारी विभागों के काम करने के तरीके पर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि सरकारी विभाग फाइलों के इधर-उधर होने या प्रशासनिक देरी का बहाना बनाकर समय सीमा के बाद दायर याचिकाओं में राहत नहीं पा सकते। अदालत के मुताबिक कानून सरकार और आम आदमी दोनों के लिए एक जैसा है और किसी को भी विशेष छूट नहीं दी जाएगी।

30 जुलाई 2026 को न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी ने एक अहम फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि मध्यस्थता निर्णयों (Arbitral Award) को चुनौती देने में हुई देरी को माफ करने के लिए सरकारी विभाग विशेष छूट का दावा नहीं कर सकते। कोर्ट ने साफ किया कि आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट, 1996 की धारा 34 के तहत प्रशासनिक बाधाओं को पर्याप्त कारण नहीं माना जाएगा। इसी कड़ी में रेल मंत्रालय की एक अपील भी 28 दिनों की देरी की वजह से खारिज कर दी गई।

यह पहली बार नहीं है जब कोर्ट ने ऐसा रुख अपनाया है। इससे पहले 24 अप्रैल 2026 को मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह ने राज्य सरकार की 11 विशेष अपीलों को खारिज किया था। उन मामलों में 93 से 195 दिनों की देरी हुई थी। तब भी कोर्ट ने कहा था कि सरकार के पास पर्याप्त संसाधन और सिस्टम होता है, इसलिए उनकी लापरवाही और उदासीनता को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता।

इसके अलावा 30 जुलाई को ही न्यायमूर्ति तेज प्रताप तिवारी ने लखनऊ की अदालतों में लंबित करीब 50,000 अंतिम रिपोर्टों पर चिंता जताई। कोर्ट ने सभी जिला एवं सत्र न्यायाधीशों को निर्देश दिया है कि वे 20 अगस्त तक इन लंबित रिपोर्टों की संख्या और देरी के कारणों का पूरा विवरण सौंपें।