Lucknow में गोमती नदी का अस्तित्व खतरे में, लोग बोले- पीने का पानी अब नाला बन गया है
Lucknow: राजधानी की जीवनरेखा कही जाने वाली गोमती नदी आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस पानी को कभी वे पीते थे, वह अब इतना गंदा हो गया है कि उसे देखना भी मुश्किल है। नदी अब धीरे-धीरे एक गं
Lucknow: राजधानी की जीवनरेखा कही जाने वाली गोमती नदी आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस पानी को कभी वे पीते थे, वह अब इतना गंदा हो गया है कि उसे देखना भी मुश्किल है। नदी अब धीरे-धीरे एक गंदे नाले में तब्दील हो चुकी है, जिससे शहर के पर्यावरण और लोगों के स्वास्थ्य पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है।
जून 2026 तक की स्थिति यह है कि नदी का पानी हाथ धोने लायक भी नहीं बचा है। जांच में पाया गया कि नदी में मल प्रदूषण तय मानकों से करीब 26 गुना ज्यादा है। इसका बड़ा कारण शहर के सीवर और गंदे नालों का सीधे नदी में गिरना है। अक्टूबर 2025 की रिपोर्ट बताती है कि लखनऊ में रोज 730 MLD सीवेज निकलता है, जिसमें से 130 MLD बिना किसी ट्रीटमेंट के सीधे गोमती में बहा दिया जाता है।
सिर्फ प्रदूषण ही नहीं, नदी का जल स्तर भी तेजी से गिर रहा है। पर्यावरणविद् प्रो. वेंकटेश दत्ता के मुताबिक, गोमती रिवरफ्रंट की 16 मीटर गहरी कंक्रीट की दीवार ने नदी और भूजल के बीच के प्राकृतिक रिश्ते को तोड़ दिया है। इस वजह से नदी के बहाव में 60% की कमी आई है और इसकी 26 सहायक नदियों में से 22 पूरी तरह सूख चुकी हैं। इसके साथ ही रोज करीब 10 मीट्रिक टन प्लास्टिक और निर्माण सामग्री नदी में फेंकी जा रही है, जिससे बहाव और रुक गया है।
| मुख्य समस्या | विवरण/डेटा |
|---|---|
| मल प्रदूषण | मानक से 26 गुना अधिक |
| बिना उपचार का सीवेज | 130 MLD प्रतिदिन |
| बहाव में कमी | लगभग 60% की गिरावट |
| सूखी सहायक नदियाँ | 26 में से 22 नदियाँ |
| दैनिक ठोस कचरा | 10 मीट्रिक टन |
सरकार ने इस स्थिति को सुधारने के लिए फरवरी 2026 में ‘Clean Gomti 2026’ कार्यशाला की, जिसमें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में नदी को बचाने की रणनीति बनाई गई। इसमें राजेंद्र सिंह और संत बलबीर सिंह सीचेवाल जैसी हस्तियों ने हिस्सा लिया। साथ ही, LDA द्वारा 7,710 करोड़ रुपये की लागत से 57 किलोमीटर लंबा ग्रीन कॉरिडोर प्रोजेक्ट भी अंतिम चरण में है। इससे पहले 2019 में NGT ने नगर निगम और जल निगम को जिम्मेदार ठहराते हुए 100 करोड़ रुपये के फंड की सिफारिश की थी ताकि गंदे नालों को रोका जा सके।