Lucknow की चिकनकारी को दुनिया भर में मिल रही पहचान, लेकिन स्थानीय लोग बोले- ये काम नहीं, हाथ की कला है
Lucknow: लखनऊ की मशहूर चिकनकारी सिर्फ एक कपड़ा नहीं बल्कि सदियों पुरानी हाथ की कला है। शहर के लोगों और कारीगरों का मानना है कि इस हुनर की असली कद्र लखनऊ से बाहर दूसरे शहरों और विदेशों में ज्यादा होती है। यह काम इतना बारी
Lucknow: लखनऊ की मशहूर चिकनकारी सिर्फ एक कपड़ा नहीं बल्कि सदियों पुरानी हाथ की कला है। शहर के लोगों और कारीगरों का मानना है कि इस हुनर की असली कद्र लखनऊ से बाहर दूसरे शहरों और विदेशों में ज्यादा होती है। यह काम इतना बारीकी वाला है कि एक ड्रेस को पूरा करने में दो से तीन महीने का समय लग जाता है।
लखनऊ की अर्थव्यवस्था में इस उद्योग का बड़ा हाथ है। सालाना करीब 550 करोड़ रुपये का कारोबार होता है और लगभग 5 लाख लोग इससे सीधे या परोक्ष रूप से जुड़े हुए हैं। यहाँ से हर साल करीब 100 करोड़ रुपये का माल गल्फ देशों में और 70 करोड़ रुपये का सामान यूरोप और अन्य ग्लोबल मार्केट में भेजा जाता है। लखनऊ चिकन एंड हैंडीक्राफ्ट एसोसिएशन के वरिष्ठ उपाध्यक्ष सुरेश छाबलानी ने भी इस क्षेत्र की अहमियत को बताया है।
इस कला में करीब 40 तरह के टांकों का इस्तेमाल होता है, जिनमें फंदा, कांटा, टेपची, बखिया और जाली वर्क प्रमुख हैं। कपड़े के चुनाव से लेकर ब्लॉक प्रिंटिंग और फिर बारीक सुई-धागे से कढ़ाई करने तक की यह प्रक्रिया बहुत मेहनत वाली होती है। इसकी खूबसूरती बढ़ाने के लिए इसमें जरदोजी, आरी और मुकेश वर्क का भी इस्तेमाल किया जाता है। हाल ही में 27 जुलाई 2026 को डिजाइनर तरुण तहिलियानी ने अपने कलेक्शन में रेशम चिकनकारी साड़ियों को पेश कर इसे आधुनिक फैशन से जोड़ा है।
हालाँकि, इस चमक के पीछे कुछ मुश्किलें भी हैं। अप्रैल 2026 में वैश्विक तनाव की वजह से एक्सपोर्ट रुक गया था, जिससे घर से काम करने वाली हजारों महिलाओं और कारीगरों की रोजी-रोटी पर असर पड़ा। साथ ही पेट्रोलियम की कीमतों में बढ़ोतरी से कच्चे माल और ट्रांसपोर्ट का खर्च बढ़ गया है, जिससे कपड़ों की कीमतों में 20 प्रतिशत तक की तेजी आने की आशंका जताई गई थी।