Maharashtra: मुंबई के पॉश इलाके में स्थित ‘High Trees’ बंगले को लेकर चल रही 25 साल लंबी कानूनी लड़ाई अब खत्म हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने Larsen & Toubro (L&T) की याचिका को खारिज कर दिया है, जिसके बाद
Maharashtra: मुंबई के पॉश इलाके में स्थित ‘High Trees’ बंगले को लेकर चल रही 25 साल लंबी कानूनी लड़ाई अब खत्म हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने Larsen & Toubro (L&T) की याचिका को खारिज कर दिया है, जिसके बाद कंपनी को इस बंगले का कब्जा छोड़ना होगा। यह फैसला उन मालिकों के पक्ष में आया है जिन्होंने सालों पहले कंपनी को बाहर निकालने की प्रक्रिया शुरू की थी।
यह पूरा विवाद क्या था और कोर्ट ने क्या कहा?
इस बंगले का किराया समझौता 1961 में हुआ था, लेकिन इसकी लीज 1970 में ही खत्म हो गई थी। मकान मालिकों ने 2001 में L&T को खाली करने के लिए केस किया था। उनका कहना था कि महाराष्ट्र रेंट कंट्रोल एक्ट, 1999 के तहत L&T को किराए की सुरक्षा नहीं मिल सकती क्योंकि कंपनी की पेड-अप शेयर कैपिटल 1 करोड़ रुपये से ज्यादा थी। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और एनवी अंजारिया ने L&T की अपील सुनने के बाद इसे खारिज कर दिया।
L&T ने कब्जा बचाने के लिए क्या दलील दी थी?
L&T ने कोर्ट में यह तर्क दिया था कि उन्होंने इस प्रॉपर्टी में हिस्सेदारी खरीदी है, इसलिए उन्हें निकाला नहीं जा सकता। कंपनी ने 2001 में 7% हिस्सा खरीदा था, जिसे बाद में बढ़ाकर 29.5% कर लिया गया था। हालांकि, बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस दलील को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह हिस्सा केवल केस से बचने के लिए खरीदा गया था। हाई कोर्ट के इसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है।
इस बंगले से कौन लोग जुड़े थे?
- A.M. Naik: L&T के पूर्व चेयरमैन और वर्तमान चेयरमैन एमेरिटस, जो 20 साल से ज्यादा समय तक इस बंगले में रहे।
- K.C. Kothari परिवार: मुख्य मकान मालिक जिन्होंने बेदखली की कार्यवाही शुरू की थी।
- Amar Munot: सह-मालिक जिनसे L&T ने प्रॉपर्टी में हिस्सा खरीदा था।
Frequently Asked Questions (FAQs)
L&T को यह बंगला क्यों छोड़ना पड़ा?
सुप्रीम कोर्ट ने L&T की याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने माना कि कंपनी की शेयर कैपिटल 1 करोड़ से अधिक होने के कारण वह रेंट कंट्रोल एक्ट के तहत सुरक्षा की हकदार नहीं थी।
यह कानूनी लड़ाई कितने समय तक चली?
यह कानूनी विवाद लगभग 25 साल तक चला। बेदखली की प्रक्रिया 2001 में शुरू हुई थी और अप्रैल 2026 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साथ यह समाप्त हुई।