Delhi: दिल्ली में वॉयस ऑफ हेल्थकेयर (VOH) की ओर से नेशनल स्ट्रोक कॉन्क्लेव 2026 का आयोजन किया गया। इस बैठक में देश के जाने-माने डॉक्टरों ने भारत में स्ट्रोक के बढ़ते खतरे पर चिंता जताई है। आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर
Delhi: दिल्ली में वॉयस ऑफ हेल्थकेयर (VOH) की ओर से नेशनल स्ट्रोक कॉन्क्लेव 2026 का आयोजन किया गया। इस बैठक में देश के जाने-माने डॉक्टरों ने भारत में स्ट्रोक के बढ़ते खतरे पर चिंता जताई है। आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर साल लगभग 18 से 20 लाख स्ट्रोक के नए मामले सामने आ रहे हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि इनमें से 15 प्रतिशत से भी कम मरीज सही समय पर अस्पताल पहुंच पाते हैं, जिससे उनकी जान बचाना या विकलांगता से रोकना मुश्किल हो जाता है।
इलाज में देरी और सुविधाओं की कमी पर क्या बोले एक्सपर्ट्स?
VOH के फाउंडर Dr. Naveen Nishchal ने बताया कि छोटे शहरों यानी टियर 3 शहरों में स्ट्रोक के इलाज की स्थिति काफी गंभीर है। वहां न केवल न्यूरोलॉजिस्ट की कमी है, बल्कि CT Scan जैसी बुनियादी मशीनों की भी भारी किल्लत देखी गई है। इंडियन स्ट्रोक एसोसिएशन के अध्यक्ष Dr. Vikram Huded ने जानकारी दी कि भारत में करीब 18 लाख मामले दर्ज होने के बाद भी केवल 5 प्रतिशत से कम मरीजों को ही जरूरी थ्रॉम्बोलीसिस इलाज मिल पाता है। इसकी मुख्य वजह अस्पतालों तक पहुंचने में होने वाली देरी और धीमा रिस्पॉन्स सिस्टम है।
स्ट्रोक के मरीजों को बचाने के लिए क्या हैं नए समाधान?
कॉन्क्लेव के दौरान विशेषज्ञों ने स्ट्रोक केयर को बेहतर बनाने के लिए कई सुझाव साझा किए जो आने वाले समय में मददगार साबित होंगे:
- Telemedicine और AI का उपयोग: वर्ल्ड स्ट्रोक ऑर्गेनाइजेशन के अध्यक्ष Dr. Jeyaraj Pandian ने बताया कि टेलीमेडिसिन और AI तकनीक के जरिए दूर के इलाकों में भी विशेषज्ञ सलाह पहुंचाई जा सकती है।
- रणनीतिक साझेदारी: Dr. Arvind Sharma ने जोर दिया कि स्ट्रोक केयर को सुधारने के लिए नई तकनीक और सरकारी नीतियों का तालमेल जरूरी है।
- जागरूकता की कमी: लोगों के बीच स्ट्रोक के लक्षणों को पहचानने के लिए जागरूकता फैलाना अनिवार्य है ताकि मरीज गोल्डन विंडो के भीतर अस्पताल पहुंच सकें।
इस कार्यक्रम में Yatharth Super Speciality Hospital और इंडिया हाइपरटेंशन कंट्रोल इनिशिएटिव ने भी अपना सहयोग दिया ताकि देश में स्ट्रोक के खिलाफ एक मजबूत हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जा सके।
Frequently Asked Questions (FAQs)
भारत में हर साल स्ट्रोक के कितने नए मामले आते हैं?
विभिन्न आंकड़ों और विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत में हर साल करीब 18 से 20 लाख स्ट्रोक के नए केस सामने आते हैं।
स्ट्रोक के इलाज में ‘गोल्डन विंडो’ का क्या महत्व है?
स्ट्रोक के बाद के शुरुआती कुछ घंटे इलाज के लिए सबसे महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन भारत में केवल 15 प्रतिशत मरीज ही इस समय सीमा के भीतर अस्पताल पहुंच पाते हैं।
छोटे शहरों में स्ट्रोक के इलाज में क्या दिक्कतें हैं?
टियर 3 जैसे छोटे शहरों में न्यूरोलॉजिस्ट की कमी और CT Scan जैसी बुनियादी जांच सुविधाओं का न होना इलाज में सबसे बड़ी बाधा है।