Delhi में विरोध प्रदर्शन के दौरान AI से चेहरों की पहचान, जंतर-मंतर पर पुलिस की निगरानी वैन का वीडियो वायरल
Delhi: राजधानी के जंतर-मंतर पर CJP (कॉकरोच जनता पार्टी) के विरोध प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस द्वारा AI-संचालित फेशियल रिकॉग्निशन सिस्टम (FRS) के इस्तेमाल को लेकर विवाद शुरू हो गया है। सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो
Delhi: राजधानी के जंतर-मंतर पर CJP (कॉकरोच जनता पार्टी) के विरोध प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस द्वारा AI-संचालित फेशियल रिकॉग्निशन सिस्टम (FRS) के इस्तेमाल को लेकर विवाद शुरू हो गया है। सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल होने के बाद लोग इस बात को लेकर चिंतित हैं कि क्या पुलिस आम लोगों की पहचान के लिए आधार डेटाबेस का इस्तेमाल कर रही है। इस मामले ने अब कानूनी मोड़ ले लिया है और दिल्ली उच्च न्यायालय में भी इसकी सुनवाई चल रही है।
यह पूरा मामला 20 और 21 जुलाई 2026 को हुए प्रदर्शनों के बाद सामने आया, जहां कुछ हिंसा भी हुई थी। पुलिस ने वहां ‘इकशाना’ नाम की एक निगरानी वैन तैनात की थी, जिसे बेंगलुरु की कंपनी Intozi ने बनाया है। पूर्व JNUSU अध्यक्ष आइशे घोष ने इस निगरानी के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की है, जिसके बाद कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस पर जवाब मांगा है।
दिल्ली पुलिस ने इन आरोपों पर अपनी सफाई देते हुए कहा है कि इस तकनीक का मकसद हर प्रदर्शनकारी की जासूसी करना नहीं है। पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, यह सिस्टम केवल तब अलर्ट देता है जब भीड़ में कोई ऐसा व्यक्ति नजर आता है जिसका आपराधिक रिकॉर्ड हो। पुलिस ने साफ तौर पर कहा है कि यह सिस्टम आधार डेटाबेस से नहीं जुड़ा है, हालांकि उन्होंने यह नहीं बताया कि चेहरों के मिलान के लिए डेटा कहां से लिया जा रहा है।
भारत में फेशियल रिकॉग्निशन तकनीक के लिए अभी तक कोई अलग से कानून नहीं बना है। डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (DPDP Act), 2023 एक सामान्य ढांचा तो देता है, लेकिन सरकारी एजेंसियों को इसमें काफी छूट मिली हुई है। दिल्ली पुलिस का यह कार्यक्रम 9 जून 2022 के एक आदेश के तहत काम करता है, जो संदिग्धों और अपराधियों की पहचान की अनुमति देता है।
कोर्ट में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि जंतर-मंतर पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए नियमित रूप से रिकॉर्डिंग की जाती है और इसे निगरानी नहीं कहा जा सकता। वहीं, पुलिस ने सोशल मीडिया पर चल रहे कई दावों को गलत बताया है और भ्रामक जानकारी फैलाने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी है। पुलिस ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच के लिए जरूरी होने पर रिकॉर्डिंग को हटाने की कोई तय समय-सीमा नहीं है।