Delhi: दिल्ली हाई कोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों को निजी सुरक्षा अधिकारी (PSO) नहीं देने पर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने दिल्ली पुलिस और दिल्ली सरकार के रवैये को असंवेदनशील और उदासीन बताया। न्यायमूर्ति मनोज जैन की पीठ ने कह
Delhi: दिल्ली हाई कोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों को निजी सुरक्षा अधिकारी (PSO) नहीं देने पर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने दिल्ली पुलिस और दिल्ली सरकार के रवैये को असंवेदनशील और उदासीन बताया। न्यायमूर्ति मनोज जैन की पीठ ने कहा कि जजों को सुरक्षा देना कोई दान नहीं है, बल्कि यह एक वैध मांग है जिसे नजरअंदाज करना न्यायपालिका की आजादी के खिलाफ है।
सुरक्षा की मांग क्यों उठी और क्या है मामला
दिल्ली न्यायिक सेवा संघ ने याचिका दायर कर बताया कि दिल्ली जैसे शहर में जजों को कई तरह के खतरों का सामना करना पड़ता है। याचिका में जजों का पीछा करने, धमकी देने और रोड रेज जैसी घटनाओं का जिक्र किया गया। यहाँ तक कि अदालत परिसर में गोलीबारी की बातें भी सामने आईं। एक महिला जज को तो यह तक धमकी दी गई कि अगर जिंदा रहना है तो कम बोलें। वरिष्ठ अधिवक्ता कीर्ति उप्पल ने कोर्ट को बताया कि महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश और पंजाब जैसे राज्यों में न्यायिक अधिकारियों को सुरक्षा मिलती है, लेकिन दिल्ली में ऐसी व्यवस्था नहीं है।
कोर्ट ने अधिकारियों को क्या निर्देश दिए
कोर्ट ने पाया कि 13 अप्रैल 2026 को हुई बैठक के नतीजे संतोषजनक नहीं थे। इसलिए कोर्ट ने अब केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार और दिल्ली पुलिस को अगले सात दिनों के भीतर फिर से बैठक करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि इस बार अधिकारियों को ठोस और अच्छे सुझावों के साथ आना होगा। इस पूरे मामले की अगली सुनवाई अब 12 मई को होगी।
सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ी मुख्य बातें
| विवरण |
जानकारी |
| मुख्य मांग |
न्यायिक अधिकारियों के आवास और ड्यूटी पर PSO की तैनाती |
| कोर्ट की टिप्पणी |
सुरक्षा न देना न्यायपालिका की स्वतंत्रता से समझौता करना है |
| तुलना राज्य |
महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश और पंजाब |
| अगली सुनवाई |
12 मई 2026 |
| संबंधित विभाग |
दिल्ली पुलिस, दिल्ली सरकार और गृह मंत्रालय (MHA) |