Delhi: दिल्ली हाईकोर्ट ने POCSO एक्ट के तहत दर्ज मामलों को रद्द करने के लिए कुछ जरूरी सिद्धांत तय किए हैं। अदालत ने साफ किया है कि यह कानून बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए है, न कि युवाओं के बीच आपसी सहमति से बने रोमा
Delhi: दिल्ली हाईकोर्ट ने POCSO एक्ट के तहत दर्ज मामलों को रद्द करने के लिए कुछ जरूरी सिद्धांत तय किए हैं। अदालत ने साफ किया है कि यह कानून बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए है, न कि युवाओं के बीच आपसी सहमति से बने रोमांटिक रिश्तों को अपराधी बनाने के लिए। यह फैसला उन मामलों में अहम होगा जहाँ कानूनी तौर पर पीड़ित खुद को किसी भी तरह के नुकसान से इनकार करती है।
POCSO मामलों में हाईकोर्ट ने क्या नियम तय किए?
अदालत ने कई महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिए हैं ताकि कानून का गलत इस्तेमाल न हो और मासूमों को सही न्याय मिले। मुख्य बिंदु नीचे दिए गए हैं:
- अगर पीड़ित खुद को किसी नुकसान से इनकार करती है, तो मामला रद्द करने के सिद्धांतों पर विचार होगा।
- सहमति से बने रोमांटिक रिश्तों को अपराध बनाने के बजाय कानून का ध्यान शोषण रोकने पर होना चाहिए।
- गिरफ्तारी के समय कारण न बताना संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है, जिससे रिमांड प्रक्रिया अवैध हो सकती है।
- बच्चों को बार-बार गवाही के लिए अदालत बुलाने के बजाय वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का इस्तेमाल करना चाहिए ताकि उन्हें मानसिक तनाव न हो।
विभिन्न फैसलों और तारीखों का विवरण
| तारीख |
अदालत का फैसला/कार्रवाई |
| 16 अप्रैल 2026 |
POCSO मामलों को रद्द करने के लिए नए सिद्धांत तय किए गए। |
| 26 मार्च 2026 |
गिरफ्तारी के कारण न बताने पर आरोपी को जमानत दी गई। |
| 15 मार्च 2026 |
पीड़ितों की गवाही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से जल्दी दर्ज करने का निर्देश। |
| 16 जनवरी 2026 |
सहमति वाले रोमांटिक रिश्तों के आधार पर 19 वर्षीय आरोपी को जमानत। |
| 28 दिसंबर 2025 |
बयान से मुकरने मात्र से आपराधिक कार्यवाही खत्म नहीं होगी। |
| 10 दिसंबर 2025 |
गंभीर अपराधों में बढ़ा-चढ़ाकर आरोप लगाने की प्रथा की निंदा की। |
जजों ने इस मामले में क्या कहा?
न्यायमूर्ति अमित महाजन ने बताया कि बच्चा डर या पारिवारिक दबाव में अपना बयान बदल सकता है, इसलिए उसे अपराधी को बचाने के बोझ से मुक्त रखना जरूरी है। वहीं न्यायमूर्ति विकास महाजन ने कहा कि POCSO एक्ट का मकसद सुरक्षा देना है, न कि करीब उम्र के लड़के-लड़कियों के स्वैच्छिक संबंधों को सजा देना। न्यायमूर्ति रजनीश भटनागर ने टिप्पणी की कि अपरिपक्व भावनाओं के कारण हुई गलतियों की वजह से अगर केस रद्द नहीं हुआ, तो इसका बुरा असर बच्चों और परिवार के जीवन पर पड़ेगा।