Delhi: दिल्ली हाई कोर्ट ने पालतू जानवरों की कस्टडी को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि पेट्स को किसी बेजान संपत्ति या सामान की तरह नहीं देखा जा सकता। जस्टिस गिरीश कथपालिया ने कहा कि जानवरों के साथ इंसा
Delhi: दिल्ली हाई कोर्ट ने पालतू जानवरों की कस्टडी को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि पेट्स को किसी बेजान संपत्ति या सामान की तरह नहीं देखा जा सकता। जस्टिस गिरीश कथपालिया ने कहा कि जानवरों के साथ इंसानों का गहरा भावनात्मक रिश्ता होता है, जिसे कस्टडी तय करते समय ध्यान में रखना जरूरी है।
क्या था पूरा मामला और कोर्ट ने क्या कहा?
यह मामला तीन फीमेल टॉय पोमेरियन कुत्तों (Mishti, Coco और Cotton) की कस्टडी से जुड़ा था। एक तरफ उनके गोद लेने वाले माता-पिता थे और दूसरी तरफ वह व्यक्ति जो खुद को असली मालिक बता रहा था। जस्टिस गिरीश कथपालिया ने 16 अप्रैल 2026 को अपने फैसले में कहा कि जानवर संवेदनशील प्राणी होते हैं। उन्हें उनके देखभाल करने वालों से अलग करने पर उन्हें भारी मानसिक तनाव हो सकता है।
कोर्ट ने कस्टडी के लिए क्या शर्तें तय कीं?
हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति के आधार पर एक संतुलित रास्ता निकाला है। कोर्ट के आदेश की मुख्य बातें नीचे दी गई हैं:
- तीनों कुत्तों को फिलहाल गोद लेने वाले माता-पिता (Petitioners) को सौंपने का निर्देश दिया गया है।
- अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए प्रति कुत्ता 50,000 रुपये का बॉन्ड भरने को कहा गया है।
- जरूरत पड़ने पर जानवरों को ट्रायल कोर्ट के सामने पेश करना होगा।
- अगर असली मालिक आपराधिक मामले में बरी हो जाता है, तो जानवरों के कल्याण को देखते हुए कस्टडी पर दोबारा विचार किया जा सकता है।
कानूनी पहलू और पिछला आदेश
यह विवाद जानवरों के प्रति क्रूरता निवारण अधिनियम की धारा 11 के तहत चल रही कार्यवाही से जुड़ा था। इससे पहले ट्रायल कोर्ट ने 11 अगस्त 2025 और 30 जनवरी 2026 को अलग आदेश दिए थे, जिन्हें अब हाई कोर्ट ने संशोधित कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी रेस्क्यू किए गए जानवर की कस्टडी का मुद्दा किसी निर्जीव वस्तु की कस्टडी जैसा नहीं हो सकता।