Delhi High Court ने HPV वैक्सीन अभियान को बताया गंभीर मामला, सुरक्षा पर उठाए सवाल
Delhi: दिल्ली हाई कोर्ट ने देश भर में चलाए जा रहे HPV वैक्सीन अभियान को एक बहुत गंभीर मामला बताया है। कोर्ट ने एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए वैक्सीन की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई और सरकार से इसके दुष्प्रभावों
Delhi: दिल्ली हाई कोर्ट ने देश भर में चलाए जा रहे HPV वैक्सीन अभियान को एक बहुत गंभीर मामला बताया है। कोर्ट ने एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए वैक्सीन की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई और सरकार से इसके दुष्प्रभावों के आंकड़ों को सार्वजनिक करने की मांग की है। इस मामले की अगली सुनवाई 29 जुलाई 2026 को होगी।
मुख्य न्यायाधीश डी के उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया ने कहा कि टीकाकरण एक अच्छी योजना है, लेकिन अगर इसके कोई बुरे प्रभाव सामने आ रहे हैं, तो सावधानी बरतना जरूरी है। कोर्ट ने स्वास्थ्य मंत्रालय (MoHFW), ICMR और CDSCO को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। कोर्ट ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा को निर्देश दिया कि वे स्वास्थ्य मंत्रालय के उन अधिकारियों से पूरी जानकारी लें जो इस अभियान से सीधे जुड़े हुए हैं।
यह पूरा मामला तब गरमाया जब याचिकाकर्ताओं, डॉ. सुजाता मित्तल और जितेंद्र चौकसे ने बताया कि फरवरी 2026 से शुरू हुए इस मुफ्त अभियान के तहत करीब 1.2 करोड़ 14 साल की लड़कियों को Gardasil-4 वैक्सीन की एक खुराक दी गई है। याचिका में तमिलनाडु की एक 14 साल की लड़की का जिक्र किया गया, जिसे वैक्सीन लगने के कुछ दिनों बाद लकवा जैसी कमजोरी, आवाज जाना और आंखों की रोशनी कम होने जैसी गंभीर समस्याएं हुईं।
याचिकाकर्ताओं ने यह सवाल भी उठाया कि भारत में बनी Cervavac वैक्सीन, जिसका क्लिनिकल ट्रायल चल रहा है, उसे नजरअंदाज कर विदेशी वैक्सीन क्यों चुनी गई। इस पर जैव प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव राजेश गोखले ने कहा कि Cervavac का परीक्षण चल रहा है और इसे 2027 के बाद राष्ट्रीय अभियान में शामिल किया जा सकता है।
गौरतलब है कि वैक्सीन बनाने वाली अमेरिकी कंपनी Merck ने जून 2026 में अमेरिका में ऑटोइम्यून बीमारियों से जुड़े 200 से ज्यादा मुकदमों का 50 मिलियन डॉलर से ज्यादा देकर निपटारा किया था। इससे पहले 2009 में गुजरात और आंध्र प्रदेश में हुए ट्रायल के दौरान भी मौतों की खबरें आई थीं, जिसके बाद 2013 में संसदीय समिति ने इसमें गंभीर अनियमितताएं पाई थीं।
सरकार की वर्तमान नीति के अनुसार, यह टीकाकरण पूरी तरह स्वैच्छिक है और इसके लिए माता-पिता की सहमति अनिवार्य है। कर्नाटक के स्वास्थ्य मंत्री यू टी खादर ने भी साफ किया है कि इस वैक्सीन को अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता और फैसला माता-पिता का ही होगा।