Delhi: दिल्ली की एक अदालत ने जासूसी के एक पुराने मामले में सेना और BSF के जवानों समेत पांच लोगों को बरी कर दिया है। कोर्ट ने इस फैसले में जांच एजेंसी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए और कहा कि पुलिस सबूत पेश करने में नाकाम र
Delhi: दिल्ली की एक अदालत ने जासूसी के एक पुराने मामले में सेना और BSF के जवानों समेत पांच लोगों को बरी कर दिया है। कोर्ट ने इस फैसले में जांच एजेंसी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए और कहा कि पुलिस सबूत पेश करने में नाकाम रही। यह मामला साल 2015 में दर्ज किया गया था, जिसमें आरोपियों पर देश की गोपनीय जानकारी साझा करने का आरोप था।
किसे मिली राहत और क्या थे आरोप?
अदालत ने मुख्य आरोपी कफायत उल्लाह खान, BSF जवान अब्दुल रशीद खान, पूर्व सेना अधिकारी मनवर अहमद मीर, साइबर एक्सपर्ट मोहम्मद साबर और सेना के जवान फरीद अहमद उर्फ सर्जन को बरी किया है। ये सभी आरोपी जम्मू और कश्मीर के रहने वाले हैं। उन पर आरोप था कि वे पाकिस्तान के एजेंट फैजल उर रहमान और ISI के साथ मिलकर LoC पर सेना की तैनाती से जुड़ी गोपनीय जानकारी साझा कर रहे थे।
कोर्ट ने बरी करने का क्या कारण बताया?
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (ASJ) शेफाली बरनाला टंडन ने 20 मई 2026 को अपना फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि दिल्ली पुलिस यह साबित नहीं कर पाई कि बरामद किए गए दस्तावेज Official Secrets Act (OSA) की धारा 3 के तहत गुप्त सरकारी रिकॉर्ड थे। कोर्ट ने साफ किया कि केवल शक के आधार पर किसी को सजा नहीं दी जा सकती, क्योंकि कानून में सबूत सबसे जरूरी होते हैं।
जांच में कहां रही कमी?
अदालत ने पाया कि पुलिस इंटरसेप्ट की गई बातचीत और ट्रांसक्रिप्ट की प्रमाणिकता साबित नहीं कर सकी। साथ ही, सीडी रिकॉर्डिंग को सुरक्षित रखने के तरीके और उसकी कस्टडी की चेन में भी खामियां नजर आईं। इसी वजह से कोर्ट ने सभी आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए उन्हें रिहा करने का आदेश दिया।
Frequently Asked Questions (FAQs)
Official Secrets Act (OSA) की धारा 3 क्या है?
OSA की धारा 3 जासूसी से जुड़ी सजाओं के बारे में है। इसमें प्रतिबंधित जगहों पर जाना, दुश्मन के काम आने वाले नोट्स बनाना या राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालने वाले गुप्त सरकारी दस्तावेजों को इकट्ठा करना या साझा करना अपराध माना जाता है।
अदालत ने आरोपियों को बरी क्यों किया?
अदालत ने पाया कि पुलिस यह साबित नहीं कर पाई कि बरामद दस्तावेज ‘गुप्त’ या ‘वर्गीकृत’ थे। साथ ही, कॉल रिकॉर्डिंग्स और सीडी की प्रमाणिकता और उनकी कस्टडी को लेकर भी सबूत पर्याप्त नहीं थे।