Maharashtra: उरण के शेवा कोलीवाड़ा से विस्थापित हुए परिवारों के लिए बॉम्बे हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने केंद्र सरकार और जवाहरलाल नेहरू पोर्ट अथॉरिटी (JNPA) को फटकार लगाते हुए पुनर्वास की प्रक्रिया को 6 हफ्
Maharashtra: उरण के शेवा कोलीवाड़ा से विस्थापित हुए परिवारों के लिए बॉम्बे हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने केंद्र सरकार और जवाहरलाल नेहरू पोर्ट अथॉरिटी (JNPA) को फटकार लगाते हुए पुनर्वास की प्रक्रिया को 6 हफ्ते के भीतर पूरा करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने इस मामले में 40 साल की देरी को गंभीर मानकर सख्त रुख अपनाया है।
40 साल का इंतजार और कोर्ट की नाराजगी
जस्टिस मनीष पिताले और जस्टिस श्रीराम शिरसाट की बेंच ने सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार और JNPA की कार्यप्रणाली की कड़ी आलोचना की। कोर्ट ने कहा कि फाइलों को एक विभाग से दूसरे विभाग में घुमाना नौकरशाही की पुरानी आदत बन गई है, जिससे कोई ठोस काम नहीं हुआ। कोर्ट ने इसे सिर्फ प्रशासनिक देरी नहीं, बल्कि मानवाधिकारों का उल्लंघन बताया। यह मामला 1983 में जमीन अधिग्रहण और 1986 में कब्जा मिलने से जुड़ा है, लेकिन प्रभावित परिवार अब तक अपने हक के लिए लड़ रहे हैं।
पुनर्वास के लिए क्या है समय सीमा और शर्तें
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि 29 अप्रैल 2026 से छह हफ्ते की समय सीमा शुरू हो चुकी है। कोर्ट ने चेतावनी दी है कि अगर इस दौरान कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो वह प्रभावित लोगों को सीधे पुनर्वास प्लॉट का कब्जा देने पर विचार करेगा। इस याचिका में महाराष्ट्र प्रोजेक्ट अफेक्टेड पर्सन्स रिहैबिलिटेशन एक्ट, 1976 के तहत कानूनी अधिकारों की मांग की गई है।
कौन-कौन से परिवार और संस्थाएं प्रभावित हैं
- कुल 256 प्रभावित परिवार इसमें शामिल हैं।
- इनमें 88 किसान और 168 गैर-किसान परिवार हैं।
- महाराष्ट्र स्मॉल स्केल ट्रेडिशनल फिश वर्कर्स यूनियन ने यह याचिका दायर की थी।
- मामले में कोंकण डिवीजन कमिश्नर, रायगढ़ जिला कलेक्टर और CIDCO जैसी एजेंसियां भी शामिल हैं।
Frequently Asked Questions (FAQs)
शेवा कोलीवाड़ा पुनर्वास मामले में हाई कोर्ट ने क्या आदेश दिया है?
बॉम्बे हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार और JNPA को आदेश दिया है कि विस्थापित परिवारों के पुनर्वास की सभी लंबित प्रक्रियाओं को 6 हफ्ते के भीतर पूरा किया जाए।
इस मामले में कितनी देरी हुई है और कितने परिवार प्रभावित हैं?
इस मामले में करीब 40 साल की देरी हुई है। इसमें कुल 256 परिवार प्रभावित हैं, जिनमें 88 किसान और 168 गैर-किसान परिवार शामिल हैं।