Maharashtra: बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि अगर ससुराल वाले पति-पत्नी के झगड़े में चुप रहते हैं या बहू का साथ नहीं देते, तो इसे ‘क्रूरता’ नहीं माना जाएगा। कोर्ट ने इस आधार पर ससुराल वालों के ख
Maharashtra: बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि अगर ससुराल वाले पति-पत्नी के झगड़े में चुप रहते हैं या बहू का साथ नहीं देते, तो इसे ‘क्रूरता’ नहीं माना जाएगा। कोर्ट ने इस आधार पर ससुराल वालों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले और कानूनी कार्यवाही को रद्द कर दिया है। जस्टिस आर.आर. भोंसले ने स्पष्ट किया कि सिर्फ मूक दर्शक बने रहने से कोई व्यक्ति अपराध का दोषी नहीं हो जाता।
क्या था पूरा मामला और कोर्ट ने क्या कहा?
यह मामला जुलाई 2022 का है जब एक 26 साल की महिला ने शादी के छह महीने बाद ही अपने 31 साल के पति, सास-ससुर, भाई और भाभी के खिलाफ FIR दर्ज कराई थी। हाई कोर्ट ने पति के खिलाफ कार्यवाही जारी रखने की अनुमति दी, लेकिन ससुराल वालों को राहत दी। कोर्ट ने कहा कि IPC की धारा 498A के तहत क्रूरता तब मानी जाती है जब कोई जानबूझकर महिला को आत्महत्या के लिए मजबूर करे या उसे गंभीर चोट पहुँचाए।
सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की अहम बातें
कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में ‘व्यावहारिक वास्तविकताओं’ को समझने पर जोर दिया। इसी तरह 26 मई 2026 को Supreme Court ने भी कहा था कि ससुराल वालों को सिर्फ इसलिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि वे झगड़ों के दौरान चुप रहे। कोर्ट के मुताबिक, ऐसा व्यवहार नैतिक रूप से गलत हो सकता है, लेकिन यह अपने आप में कोई आपराधिक जुर्म नहीं है।
Frequently Asked Questions (FAQs)
IPC की धारा 498A के तहत क्रूरता क्या होती है?
कोर्ट के अनुसार, धारा 498A के तहत क्रूरता वह जानबूझकर किया गया काम है जिसका मकसद महिला को आत्महत्या के लिए उकसाना या उसके जीवन, स्वास्थ्य और शरीर को गंभीर नुकसान पहुँचाना हो।
ससुराल वालों को इस केस में राहत क्यों मिली?
कोर्ट ने माना कि ससुराल वालों का चुप रहना या बहू का पक्ष न लेना ‘क्रूरता’ की श्रेणी में नहीं आता। उनके खिलाफ लगाए गए आरोप अस्पष्ट थे और वे केवल मूक दर्शक थे।